Friday, June 7, 2019

क्या यह नए शीतयुद्ध की शुरुआत है ?

 अपने छोटे से जीवनकाल में मानव सभ्यता ने अनेक प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाएं देखी हैं। प्राकृतिक आपदाओं पर तो मनुष्य का वश नहीं है किंतु मानव निर्मित आपदाओं की बात करें तो हमने असंख्य भीषण युद्धों और निर्दयी तानशाहों के बारे में पढ़ा है जिन्होंने मानव सभ्यता के इतिहास को रक्त रंजित बनाया।
 ये युद्ध नहीं होते तो शायद दुनिया का चेहरा भिन्न होता। इन निरंतर होते युद्धों से थोड़ी शांति तब मिली जब 1945 में दुनिया दो हिस्सों में बंटी और महशक्तियों के बीच थोड़ा शक्ति-संतुलन स्थापित हुआ। युद्ध न हो इसके लिए रूस और अमेरिका एक-दूसरे के सामने पांच दशकों तक परमाणु बम का बटन हाथ में रखते हुए आंखों में आंख डाले खड़े रहे। यह शीतयुद्ध का कालखंड था। दुनिया इतने दशकों तक परमाणु बम के खतरे पर बैठी रही परंतु शुक्र है कि कोई हादसा नहीं हुआ अन्यथा पृथ्वी से मानवता ही समाप्त हो जाती। समय समय पर कुछ महान हस्तियों ने अपनी दूरदृष्टि से दुनिया को सही मोड़ देने का प्रयास किया और उनके न्यायोचित निर्णयों से मानव जीवन आगे बढ़ता गया।
ऐसा ही एक निर्णय लिया था सन् 1987 में तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव और अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने। दोनों ने माध्यम दूरी के परमाणु आयुधों का विस्तार रोकने के लिए एक (आईएनएफ) संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार 500 से 5,500 किमी के बीच की सीमा में पृथ्वी की सतह से छोड़ी जाने वाली मध्यम दूरी की मिसाइलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह निर्णय परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में एक मील का पत्थर था।
 उसके बाद तो पिछले तीन दशकों में अमेरिका और रूस ने अपने परमाणु शस्त्रागारों को सीमित करने तथा कम करने के लिए अनेक संयुक्त समझौतों पर हस्ताक्षर किए। विश्व ने चैन की सांस ली ही थी, किंतु जैसा हम जानते हैं मनुष्य की फितरत है कि वह किसी एक स्थिति में लंबे समय तक न तो रह सकता है और न ही किसी एक संधि में वर्षों तक बंध सकता है। 
रूस द्वारा चोरी-छुपे इस संधि के उल्लंघन की खबरें आने लगी थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने इसका संज्ञान लेकर 1987 में की गई निरस्त्रीकरण संधि से बाहर निकलने की धमकी दे डाली। ट्रम्प ने आरोप भी लगा दिया कि रूस 'कई वर्षों से इस संधि का उल्लंघन कर रहा है।' उधर रूस ने इस आरोप को खारिज करते हुए ट्रम्प के बयान की आलोचना की  और अपनी ओर से भी उचित कदम उठाने की धमकी दे दी । जर्मनी, अमेरिका के इस कदम की आलोचना करने वाला पहला अमेरिकी सहयोगी देश था। 
पूर्व सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव, जो अभी जीवित हैं, ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की इस महत्वपूर्ण परमाणु हथियार संधि से हट जाने के इरादे को हताशा भरा बताते हुए कहा कि ऐसे किसी भी कदम से परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयासों को एक बहुत बड़ा झटका लगेगा।
सवाल यह उठता है कि क्या अमरीका असंवेदनशील और महत्वकांक्षी था ,या रूस सोवियत जमाने की महानता के विषाद से कभी निकल नहीं पाया? क्यों चीजें अब बिगड़ गई हैं और क्या मौजूदा हालात एक 'नए शीत युद्ध' की शुरुआत है?
मैं इन सभी सवालों का कोई माकूल जवाब देने की कोशिश नहीं कर रहा हूं बल्कि मैं बस कुछ बिंदुओं पर यहां रोशनी डालने की कोशिश कर रहा हूं.
ब्रिटेन की ख़ुफिया इंटेलीजेंस सर्विस (एम16) के पूर्व मुखिया सर जॉन सैवर्स
 बीबीसी से अपने इंटरव्यू में कहा, "अमरीका के अगले राष्ट्रपति पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी कि वो नए सिरे से रूस के साथ संबंधों को विकसित करें. हम रूस के साथ रिश्तों में कोई बहुत गर्माहट की उम्मीद नहीं करते और ना ही रूखे संबंध की उम्मीद करते हैं."
औऱ तीसरी बार राष्ट्रपति बनने के एक साल बाद ही पुतिन ने सबसे पहले अपने पड़ोसी देश यूक्रेन के राज्य क्रीमिया को रूस में शामिल करने की कोशिशें तेज कर दीं. यूरोपीय संघ, और अमेरिकी सदस्यता वाले नाटो समूह के प्रबल विरोध के बाद भी वे पीछे नहीं हटे. कई दिनों के संघर्ष के बाद रूसी सेना ने आखिरकार क्रीमिया को मार्च 2014 में अपने कब्जे में ले ही लिया. इस घटना से नाराज अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए.। इस घटना के करीब साल भर बाद ही रूस ने अपनी नीतियों से अलग पहली बार मध्य पूर्व की राजनीति में दखल दिया. उसने 2015 में सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध में राष्ट्रपति बशर अल असद का साथ देने का ऐलान कर दिया. अमेरिका के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं था क्योंकि वह सीरिया में राष्ट्रपति असद को सत्ता से हटाने की मुहिम पर लगा था. रूस के इस फैसले से उसे क्रीमिया के बाद एक बार फिर विश्व पटल पर अपनी किरकिरी होने का डर भी सता रहा था. रूस के सीरिया में दखल के बाद वैसा ही हुआ भी. वहां अमेरिका, सऊदी अरब और इजरायल के समर्थन वाले विद्रोही गुटों को रूसी हमलों के बाद मुंह की खानी पड़ी. असद सरकार ने रूस की मदद से एक के बाद एक होम्स, हामा, दमिश्क, लताकिया और अलेप्पो जैसे अपने बड़े शहरों पर वापस अपना कब्जा जमा लिया
ईन सभी मामलों के बाद रूस द्वारा अमेरिकी चुनाव में दखल देना हाल की सबसे बड़ी घटना रही है औऱ जिससे शीत युद्ध की शुरुआत मानी जा रही है ।
 अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के सबूतों के बाद इस पर कोई शक नहीं रह गया है कि अमेरिकी चुनाव में हिलरी क्लिंटन को हरवाने के लिए हैकिंग पुतिन के कहने पर ही की गयी थी
सितम्बर 2016 से सीरिया में रूसी और सीरियाई सेना के हमले तेज़ होने के बाद से अमरीका और रूस के बीच तनाव बढ़ा और अमरीका ने सीरिया युद्ध पर रूस के साथ बातचीत को निलंबित कर दिया.
दोनों देशों में समझौता हुआ था जिसके मुताबिक सीरिया में युद्धविराम लागू होना था और इसके सफल होने की स्थिति में अमरीका और रूस जेहादियों को निशाना बनाने के लिए संयुक्त सैन्य सेल बनाने पर सहमत हुए थे.
अमरीका ने सीरिया और रूस पर नागरिकों, अस्पतालों और मानवीय सहायता संगठनों को निशाना बनाकर हमले तेज़ करने का आरोप लगाया था ।
: पिछले चार वर्षों में चौथी बार अमेरिका और रूस ने एक-दूसरे के विरुद्ध शीत युद्ध जैसे कूटनीतिक तल्ख माहौल को जन्म दिया है। साल 2014 में साइबेरिया पर रूसी आक्रमण के बाद सीरिया और जासूसी कांड के बाद परमाणु हथियारों से संबंधित 'आईएनएफ संधि-1987' दोनों देशों के बीच विवाद का कारण बनी है। यह विवाद नए सिरे से सतह पर आ गया है। कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जब तक रूस और चीन अपने हथियारों पर अंकुश नहीं लगाते, तब तक अमेरिका भी अपने परमाणु हथियारों काे बढ़ाता रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ कर दिया है कि अमेरिका आईएनएफ संधि से अलग हो जाएगा। गौरतलब है कि दोनों देशों ने इस संधि पर उसने शीत युद्ध के दौरान 1987 में हस्ताक्षर किए थे।
: अमेरिका ने यूक्रेन मुद्दे में रूस की भूमिका का समर्थन करने वाले व्यक्तियों व संस्थाओं के खिलाफ नया प्रतिबंध लागू कर दिया . अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेजरी ने नवम्बर 2018 को एक बयान जारी कर यह जानकारी दी थी । समाचार एजेंसी शिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेजरी विभाग ने बयान में कहा कि तीन व्यक्तियों व नौ संस्थाओं पर प्रतिबंध का आदेश दिया गया है, जो गंभीर मानवाधिकार दुर्व्यवहार या क्रीमिया क्षेत्र में रूसी हित में लगे हुए हैं ।
बयान में कहा गया कि इन सभी व्यक्तियों व संस्थाओं की संपत्ति अमेरिकी अधिकार क्षेत्र के अधीन है और अमेरिकी व्यक्तियों को सामान्य रूप से इन व्यक्तियों के साथ लेन-देन पर रोक लगाई गई है.जो दोनों देशों की नफ़रत को दर्शाता है । अमेरिकी विदेश विभाग ने उस समय कहा कि वह रूस पर मार्च में ब्रिटेन में पूर्व रूसी जासूस पर नर्व एजेंट हमले में शामिल होने को लेकर उस पर दूसरे चरण के प्रतिबंध लगा सकता है । तो जाहिर सी बात है कि रूस का फिर पलटवार होगा और कोई भी एक दूसरे से कम होने को तो बिल्कुल भी तैयार न होंगे ...ऐसा इतिहास बताता है ।: 2019  की बात करें तो संयुक्त राष्ट्र के लिए रूसी दूत वसिली नेबेन्ज़िया ने चेतावनी दी है कि अगर अमरीका सीरिया पर हमला करता है तो इससे रूस और अमरीका के बीच युद्ध के हालात बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि वो किसी भी तरह की संभावना से इनकार नहीं करते। नेबांजिया ने अमरीका और उसके मित्र देशों पर आरोप लगाया कि वो अपनी आक्रामक नीतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय शांति को खतरे में डाल रहे हैं।
: सीरिया में रासायनिक हमले को लेकर रूस और अमेरिका की तनातनी के बीच भारत ने जता दिया है कि वह भी इन अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्दों पर चुप नहीं बैठेगा। 
रासायनिक हथियारों के इस्‍तेमाल कर मुद्दा इन दिनों अंतर्राष्‍ट्रीय सुर्खियों में है। सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्‍तेमाल के मुद्दे पर जहां अमेरिका और रूस आमने-सामने हैं, वहीं पूर्व जासूस डबल एजेंट सर्गेई स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया को जहर देने के मुद्दे पर ब्रिटेन और रूस के बीच तनातनी है। इस मुद्दे को लेकर ब्रिटेन ने कई रूसी राजनयिकों को देश से निकाल दिया। ब्रिटेन को इस मामले में अमेरिका का भी साथ मिला। हालांकि रूस पूर्व जासूस को जहर देने के मामले में अपनी किसी भी तरह की संलिप्‍तता से इनकार करता रहा है।
इन धमकियों, परेशानियों, हथियारों के दौर से इतना तो साबित हो गया है कि यह शीत युद्ध की आहट है, अगर हम इसे आहट न भी माने तो शीत युद्ध की प्रवृत्ति उस समय से (1945-1990)  मिलती जुलती है । आरोपों का दौर चालू है, अमेरिका अपने हितों में सिमट रहा है औऱ रूस विश्व पर पुनः वर्चस्व स्थापित करना चाहता है ।
                         उपसंहार स्वरूप जब तक दोनों देशों के बीच कोई भारत या सऊदी सरीखा देश  मध्यस्थता को नहीं आता तब तक हालात ऐसे ही बने रहेंगे । फिर यह सवाल उठेगा की आखिर ये बड़े देश क्यों इन लोगों की बातें मानेंगे ? 
मेरे मतानुसार शीत युद्ध तो कभी समाप्त हुआ ही नहीं था क्योंकि वो कड़वाहट (सोवियत विभाजन) तो आज तक नहीं मिटी और स्वार्थ किसी भी रिश्ते को तटस्थ कहाँ रहने देता है ? और ये तो फिर भी वर्चस्व, व्यापार और अहंकार का छद्म युद्ध है ।beginning of cold warनया शीतयुद्ध

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